बिरसा मुंडा
पाठ्यक्रम: GS1/ आधुनिक इतिहास
संदर्भ
- प्रधानमंत्री ने धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा जी की शहादत दिवस पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।
परिचय
- बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को तत्कालीन बंगाल प्रेसीडेंसी (वर्तमान झारखंड) के उलीहातु गाँव में हुआ था।
- वे मुंडा जनजाति के एक महान भारतीय आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी, धार्मिक नेता एवं लोकनायक थे।
- बिरसैत धर्म: उन्होंने ‘बिरसैत’ नामक एक नए धर्म की स्थापना की और स्वयं को ईश्वर का दूत घोषित किया।
- वे एकेश्वरवाद (एक ईश्वर में विश्वास) के समर्थक थे।
- मुंडा एवं उरांव समुदाय के अनेक लोग इस पंथ से जुड़े और उन्होंने आदिवासियों के धर्मांतरण संबंधी ब्रिटिश गतिविधियों का विरोध किया।
- धरती आबा: उनके अनुयायी उन्हें ‘धरती आबा’ (पृथ्वी के पिता) के नाम से संबोधित करते थे।
- मुंडा विद्रोह: यह ब्रिटिश शासन तथा स्थानीय शोषकों (दिकुओं) के अत्याचारों के विरुद्ध बिरसा मुंडा के नेतृत्व में चलाया गया एक जनजातीय आंदोलन था।
- इसे ‘उलगुलान’ (महा-आंदोलन/महान कोलाहल) के नाम से भी जाना जाता है।
- निधन: वर्ष 1900 में उन्हें जमकोपाई वन से गिरफ्तार किया गया।
- बाद में हैजा के कारण कारावास में ही उनका निधन हो गया।
- परिणाम: ब्रिटिश सरकार ने वर्ष 1908 में छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम लागू किया।
- इस अधिनियम का उद्देश्य आदिवासी भूमि को गैर-आदिवासियों (दिकुओं) को हस्तांतरित होने से रोकना था।
- जनजातीय गौरव दिवस: उनकी स्मृति और योगदान के सम्मान में वर्ष 2021 से प्रत्येक वर्ष 15 नवम्बर को जनजातीय गौरव दिवस मनाया जाता है।
स्रोत: PIB
हिंदू कुश हिमालय (HKH)
पाठ्यक्रम: GS1/ भूगोल
संदर्भ
- HKH मानसून आउटलुक 2026 के अनुसार, वर्ष 2026 के मानसून मौसम के दौरान हिंदू कुश हिमालय (HKH) क्षेत्र में सामान्य से कम वर्षा तथा सामान्य से अधिक तापमान रहने का अनुमान है।
हिंदू कुश हिमालय (HKH)
- हिंदू कुश हिमालय पर्वतमाला लगभग 3,500 किलोमीटर तक फैली हुई है।
- यह आठ देशों में विस्तृत है—
- अफगानिस्तान
- बांग्लादेश
- भूटान
- चीन
- भारत
- नेपाल
- म्यांमार
- पाकिस्तान
- एशिया के जल टावर: इन पर्वतों को “एशिया के जल टावर ” भी कहा जाता है।
- ये एशिया की 10 महत्त्वपूर्ण नदी प्रणालियों के उद्गम स्थल हैं—
- अमू दरिया
- सिंधु
- गंगा
- ब्रह्मपुत्र
- इरावदी
- सालवीन
- मेकॉन्ग
- यांग्त्सी
- ह्वांग हो (पीली नदी)
- तारिम
- ये एशिया की 10 महत्त्वपूर्ण नदी प्रणालियों के उद्गम स्थल हैं—
- महत्त्व: इन नदी बेसिनों से विश्व की लगभग एक-चौथाई जनसंख्या को जल उपलब्ध होता है।
- HKH क्षेत्र में रहने वाले लगभग 24 करोड़ लोगों के लिए ये स्वच्छ जल का एक महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं।

स्रोत: IE
कोयला विनिमय नियम, 2026
पाठ्यक्रम: GS3/ ऊर्जा
संदर्भ
- कोयला मंत्रालय ने कोयला विनिमय नियम, 2026 अधिसूचित किए हैं, जिससे देश में कोयला विनिमय की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ है। इसका उद्देश्य पारदर्शी एवं बाजार-आधारित कोयला व्यापार को बढ़ावा देना है।
कोयला विनिमय क्या है?
- कोयला विनिमय एक इलेक्ट्रॉनिक बाजार मंच है, जहाँ कोयला उत्पादक, उपभोक्ता, व्यापारी तथा अन्य प्रतिभागी पारदर्शी व्यापारिक तंत्र के माध्यम से कोयले की खरीद एवं बिक्री कर सकते हैं।
- यह मांग एवं आपूर्ति की बाजार स्थितियों के आधार पर कोयले के मूल्य का कुशल निर्धारण सुनिश्चित करता है।
कोयला विनिमय नियम, 2026 की प्रमुख विशेषताएँ
- बाजार-आधारित व्यापार: यह व्यवस्था कोयला विपणन को पारंपरिक ‘एक से अनेक’ मॉडल से ‘अनेक से अनेक’ व्यापार मॉडल में परिवर्तित करती है।
- मूल्य निर्धारण: कोयले की कीमतें प्रशासनिक आवंटन के बजाय बाजार शक्तियों द्वारा निर्धारित की जाएँगी।
- नियामकीय निगरानी: कोयला नियंत्रक संगठन को इन विनिमयों के पंजीकरण एवं पर्यवेक्षण हेतु नोडल प्राधिकरण बनाया गया है।
- विनिमय का पंजीकरण: विनिमय संचालित करने वाली इकाई का भारत में कंपनी के रूप में पंजीकृत होना आवश्यक होगा।
- न्यूनतम ₹50 करोड़ की निवल संपत्ति अनिवार्य होगी।
- पंजीकरण 25 वर्षों के लिए प्रदान किया जाएगा।
- संक्रमण अवधि: पहले पंजीकृत कोयला विनिमय के प्रारंभ होने के छह माह के अंदर पूर्व-विद्यमान इलेक्ट्रॉनिक कोयला व्यापार मंचों को स्वयं को कोयला विनिमय के रूप में पंजीकृत कराना होगा।
- विम्युचुअलाइजेशन : विनिमय के स्वामित्व एवं प्रबंधन के पास किसी प्रकार के व्यापारिक अधिकार नहीं होंगे।
भारत में कोयला क्षेत्र
- भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा कोयला उत्पादक और उपभोक्ता है।
- भारत के पास विश्व का पाँचवाँ सबसे बड़ा कोयला भंडार है।
- देश की प्राथमिक वाणिज्यिक ऊर्जा आवश्यकताओं का लगभग 55% कोयले से पूरा होता है।
- भारत में कुल विद्युत उत्पादन का लगभग 70% भाग कोयले पर आधारित है।
- प्रमुख कोयला उत्पादक राज्य: ओडिशा
- झारखंड
- छत्तीसगढ़
- मध्य प्रदेश
- पश्चिम बंगाल
स्रोत: AIR
डार्क पैटर्न
पाठ्यक्रम: GS3/ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी
संदर्भ
- एक रिपोर्ट के अनुसार, ऑनलाइन बाज़ारों में डार्क पैटर्न के कारण भारतीय उपभोक्ताओं को प्रतिवर्ष लगभग 25,000 करोड़ रुपये से 28,000 करोड़ रुपये तक की हानि हो रही है।
परिचय
- डार्क पैटर्न ऐसे यूज़र इंटरफेस (UI) अथवा यूज़र अनुभव (UX) आधारित डिज़ाइन होते हैं, जो लोगों को ऐसे निर्णय लेने के लिए प्रभावित, दबावग्रस्त अथवा भ्रमित करते हैं, जिन्हें वे सामान्य परिस्थितियों में नहीं लेते।
- ‘डार्क पैटर्न’ शब्द का प्रयोग पहली बार हैरी ब्रिग्नुल ने वर्ष 2010 में किया था।
- इसमें विभिन्न प्रकार की भ्रामक एवं हेरफेर करने वाली प्रथाएँ शामिल हैं, जैसे—
- ड्रिप प्राइसिंग
- छद्म विज्ञापन
- बेट-एंड-क्लिक
- विकल्पों में हेरफेर
- कृत्रिम तात्कालिकता
- गोपनीयता संबंधी चिंताएँ
- डार्क पैटर्न के प्रभाव: डार्क पैटर्न—
- सूचित सहमति को कमजोर करते हैं।
- उपयोगकर्ताओं की स्वायत्तता को कम करते हैं।
- अनचाही खरीदारी अथवा डेटा साझा करने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।
- उत्पादों एवं कंपनियों के प्रति विश्वास को कमजोर करते हैं।
भारत में डार्क पैटर्न से संबंधित कानून
- उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 एवं CCPA दिशानिर्देश, 2023: उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) को अनुचित व्यापारिक प्रथाओं पर नियंत्रण हेतु अधिकार प्रदान करता है।
- डार्क पैटर्न की रोकथाम एवं विनियमन संबंधी CCPA दिशानिर्देश, 2023 में निम्नलिखित भ्रामक प्रथाओं पर स्पष्ट रूप से प्रतिबंध लगाया गया है—
- कृत्रिम तात्कालिकता
- बास्केट स्नीकिंग
- कन्फर्म शेमिंग
- सब्सक्रिप्शन ट्रैप
- डार्क पैटर्न की रोकथाम एवं विनियमन संबंधी CCPA दिशानिर्देश, 2023 में निम्नलिखित भ्रामक प्रथाओं पर स्पष्ट रूप से प्रतिबंध लगाया गया है—
- उपभोक्ता संरक्षण (ई-कॉमर्स) नियम, 2020: मूल्य निर्धारण, विज्ञापनों एवं बिक्री की शर्तों में पारदर्शिता सुनिश्चित करते हैं।
- ई-कॉमर्स मंचों पर भ्रामक प्रथाओं को प्रतिबंधित करते हैं।
- डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023: डेटा प्रसंस्करण के लिए स्वतंत्र, सूचित एवं स्पष्ट सहमति को अनिवार्य बनाता है।
- इससे उपयोगकर्ताओं को व्यक्तिगत डेटा साझा करने हेतु प्रभावित करने वाले डार्क पैटर्न को हतोत्साहित किया जाता है।
स्रोत: TH
डिजिटल अरेस्ट
पाठ्यक्रम: GS3/ साइबर अपराध
संदर्भ
- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के अनुसार, विगत छह वर्षों में भारतीय नागरिकों को साइबर-सक्षम धोखाधड़ी के कारण लगभग 52,976 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है, जिसमें लगभग 8% हानि “डिजिटल अरेस्ट” घोटालों से संबंधित है।
परिचय
- डिजिटल अरेस्ट एक प्रकार का साइबर धोखाधड़ी (Cyber Scam) है, जिसमें अपराधी—
- फर्जी वीडियो कॉल,
- जाली पहचान-पत्र (Forged IDs),
- तथा सरकारी वेबसाइटों जैसी दिखने वाली नकली वेबसाइटों का उपयोग करके व्यक्तियों पर झूठे आपराधिक आरोप लगाते हैं और उनसे धन वसूलने के लिए दबाव बनाते हैं।
- उभरती चुनौतियाँ:
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI)
- डीपफेक
- कृत्रिम पहचान
- जैसी उभरती प्रौद्योगिकियाँ भविष्य में ऐसे धोखाधड़ी के मामलों को और अधिक विश्वसनीय तथा पहचानने में कठिन बना सकती हैं।
- सरकारी पहल: गृह मंत्रालय (MHA)
- भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C)
- द्वारा इस संबंध में जन-जागरूकता परामर्श जारी किए गए हैं।
स्रोत: TH
नए नियमों के अंतर्गत कॉस्टिक सोडा उद्योग के अपशिष्ट जल के लिए मछली जीवितता परीक्षण अनिवार्य
पाठ्यक्रम: GS3/ पर्यावरण
संदर्भ
- केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित नए पर्यावरणीय मानकों के अनुसार, अब मेम्ब्रेन सेल प्रौद्योगिकी का उपयोग करने वाले कॉस्टिक सोडा संयंत्रों के अपशिष्ट जल को प्रयोगशाला-आधारित मछली जीवितता परीक्षण में सफल होना अनिवार्य होगा।
परिचय
- नए मानक केवल उन स्वतंत्र कॉस्टिक सोडा संयंत्रों पर लागू होंगे जो मेम्ब्रेन सेल प्रौद्योगिकी का उपयोग करते हैं।
- मेम्ब्रेन सेल प्रौद्योगिकी रासायनिक प्रक्रिया को नियंत्रित करने हेतु विशेष झिल्ली का उपयोग करती है।
- इसे पुरानी पारा-आधारित प्रक्रियाओं की तुलना में कम प्रदूषणकारी माना जाता है।
नए मानकों की प्रमुख विशेषताएँ
- प्रयोगशाला-आधारित बायोअसे परीक्षण में 100% अपशिष्ट जल में 96 घंटे तक रखने के बाद कम-से-कम 90% मछलियों का जीवित रहना आवश्यक होगा।
- मानकों में निम्नलिखित के लिए भी सीमाएँ निर्धारित की गई हैं—
- pH स्तर
- क्लोराइड
- निलंबित ठोस पदार्थ
- घुले हुए ठोस पदार्थ
- जल उपयोग
- अपशिष्ट जल उत्पादन
- चुनौतियाँ: विशेषज्ञों के अनुसार इन मानकों की सफलता प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी, क्योंकि—
- बायोअसे परीक्षण हेतु विशेष प्रयोगशालाओं की आवश्यकता होती है।
- प्रशिक्षित कर्मियों की आवश्यकता होती है।
- नियमित एवं स्वतंत्र निगरानी अनिवार्य होती है।
कॉस्टिक सोडा
- कॉस्टिक सोडा, जिसे सोडियम हाइड्रॉक्साइड भी कहा जाता है, भारत में सर्वाधिक उपयोग किए जाने वाले औद्योगिक रसायनों में से एक है।
- उपयोग: इसका उपयोग निम्नलिखित उद्योगों में किया जाता है—
- साबुन उद्योग
- डिटर्जेंट उद्योग
- कागज उद्योग
- वस्त्र उद्योग
- एल्युमिनियम उद्योग
- पेट्रो-रसायन उद्योग
- जल शोधन
- भारत में उत्पादन: भारत में लगभग 32 से 37 कॉस्टिक सोडा संयंत्र संचालित हैं।
- इनका वार्षिक उत्पादन 50 लाख मीट्रिक टन (5 मिलियन मीट्रिक टन) से अधिक है।
- पर्यावरणीय चिंताएँ: कॉस्टिक सोडा उद्योग पर्यावरणीय जोखिम भी उत्पन्न कर सकता है क्योंकि इसका अपशिष्ट जल—
- अत्यधिक क्षारीय होता है,
- उच्च लवणता युक्त होता है,
- तथा इसमें क्लोरीन, हाइड्रोक्लोरिक अम्ल एवं घुले हुए ठोस पदार्थों की उच्च मात्रा हो सकती है।
स्रोत: DTE
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संक्षिप्त समाचार 11-06-2026